ज़िन्दगी रोज़ पन्ने पलटती है

चार अध्यायों वाली

बाल, युवा, जवानी और वृद्ध।

हर पन्ना एक कहानी

शुरु करता है, अधूरा ही

अगली कहानी पर आ जाता है।

सफ़ेद कागज़ हर रोंज़

कहानी तो होती है

मगर हर कहानी

अधूरी ही रह जाती है।

पता है क्यों?

लिखने वाला

अधूरा हि अगले

पन्ने पर आ जाता है

और ज़िन्दगी के

चार अध्याय भर जाते है

अनेकों कहानी सहित

मगर एक भी पूरी नहीं होती!

©दीप्ति विश्वनाथ

2 thoughts on “ज़िन्दगी – एक कहानी नहीं।

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