रिश्तों को बनते भी देखा, बिछड़ते भी देखा

ऊँचाई तक पहुँचते भी देखा, गिरते भी देखा

ओ रे नादान मन! पकड़ने क्यों चला तू

एक बात तो समझ अब ! समझ अब!!

अब बस! रिश्तों को बदलते देख अब!

एक ही रिश्ता तो है, उसे तो तू छोड़ चला!

अब खुद से ही रिश्ता जोड़ के तू चल!

है तुझ में ही वह,

जो जान है सबकी!

रिश्ता तो बस उसी से बना के रख अब।

नाम अनेक है उसके,

कहीं ईश्वर कह कर बुला लिया,

कभी अल्लाह, तो मसीहा कहा कभी।

जुड़ा उससे, तो ओ रे मन!

रिश्ता फिर कोई रहा कब!

चल बस, अब नादानी छोड़!

जो बदले, वह रिश्तों से मोड़ खुद को अब।

बना वह रिश्ता अब दृढ़,

जुड़कर जिससे सिर्फ़, अब सब रिश्ते रहे।

– दीप्ति विश्वनाथ