इन्द्रियों से जुड़कर जगत देखा।

इन्द्रियों को छोड़ा तो स्वप्न देखा।

प्रार्थना की तो ईश्वर देखा।

जिससे देखा, उसे देखूँ कैसे?

जिसने देखा, उसे देखूँ कैसे?

बस जानने निकली थी मैं,

कि जान लिया,

इस मैं ने ही तो

द्रष्टा रोका!

अब देख रही हूँ,

कि इस मैं को मैं से

छोड़ूँ कैसे!

– दीप्ति विश्वनाथ।